भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता-केंद्रित वैश्विक क्षमता केंद्र (GCC) 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत का वैश्विक क्षमता केंद्र (GCC) पारिस्थितिकी तंत्र तीव्र रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अब अपने भारत स्थित केंद्रों का उपयोग केवल बैक-ऑफिस संचालन के लिए ही नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) विकास, इंजीनियरिंग, अनुसंधान और वैश्विक व्यापार कार्यों के लिए भी कर रही हैं।

वैश्विक क्षमता केंद्र (GCCs) क्या हैं?

  • GCCs वे ऑफशोर इकाइयाँ हैं जिन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी वैश्विक परिचालन के लिए सामरिक व्यापारिक कार्यों को संपन्न करने हेतु स्थापित करती हैं।
  • इन कार्यों में प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर विकास, इंजीनियरिंग और अनुसंधान एवं विकास (R&D), वित्त और लेखांकन, डेटा विश्लेषण, उत्पाद विकास तथा परिचालन प्रबंधन शामिल हैं।
  • भारत में वर्तमान में लगभग 2,117 GCCs हैं, जो लगभग 2.36 मिलियन पेशेवरों को रोजगार प्रदान करते हैं और FY26 में लगभग $98.4 बिलियन का राजस्व उत्पन्न करते हैं (नैसकॉम-ज़िनोव रिपोर्ट)।
    • विगत पाँच वर्षों में यह क्षेत्र लगभग 32% बढ़ा है, और इस अवधि में 500 से अधिक नए GCCs स्थापित किए गए हैं।

भारत में GCCs का विकास

  • लागत लाभ से सामरिक स्वामित्व तक: पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल परिचालन लागत कम करने पर केंद्रित था।
  • अब GCCs उत्पाद स्वामित्व, AI परिनियोजन, प्लेटफ़ॉर्म इंजीनियरिंग और व्यापार रूपांतरण कार्यक्रमों को संभाल रहे हैं।
  • नैसकॉम-ज़िनोव रिपोर्ट इस परिवर्तन को ‘डिलीवरी इंजन’ से ‘एंटरप्राइज नर्व सेंटर’ की ओर संक्रमण के रूप में वर्णित करती है।
  • AI-नेतृत्व वाले GCCs का उदय: AI GCCs के रूपांतरण का केंद्र बन गया है। प्रमुख प्रवृत्तियाँ:
    • भारत में 1,200 से अधिक GCCs अब AI और मशीन लर्निंग क्षमताओं से युक्त हैं।
    • 250 से अधिक AI/ML उत्कृष्टता केंद्र (CoEs) स्थापित किए गए हैं।
    • भारत में 250,000 से अधिक AI पेशेवर कार्यरत हैं, जिससे यह अमेरिका के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा एंटरप्राइज AI प्रतिभा केंद्र बन गया है।

भारत के लिए GCCs का महत्व

  • आर्थिक योगदान: GCCs निर्यात आय, उच्च-कौशल रोजगार, शहरी आर्थिक विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
  • राजस्व वृद्धि: लगभग $100 बिलियन का राजस्व भारत की सेवाओं की अर्थव्यवस्था में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
  • रोजगार सृजन: GCCs इंजीनियरिंग, AI और डेटा विज्ञान, वित्त, साइबर सुरक्षा, अनुसंधान और विकास में बड़े पैमाने पर रोजगार अवसर उत्पन्न करते हैं।
  • वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण: GCC पारिस्थितिकी तंत्र भारत की वैश्विक उत्पादन और नवाचार नेटवर्क में भागीदारी को सुदृढ़ करता है।
  • यह भारत को उत्पाद नवाचार, उन्नत इंजीनियरिंग और अनुसंधान-आधारित गतिविधियों में उच्चतर स्थान दिलाता है।
  • GCCs बनाम पारंपरिक आईटी सेवा कंपनियाँ: GCCs का उदय भारत के आईटी सेवा उद्योग को पुनः आकार दे रहा है।
    • पारंपरिक आईटी कंपनियाँ ऐतिहासिक रूप से श्रम-गहन आउटसोर्सिंग और टाइम-एंड-मैटेरियल अनुबंधों पर निर्भर थीं।
    • GCCs अब एंड-टू-एंड स्वामित्व, वैल्यू-शेयर और गेन-शेयर मॉडल तथा उत्पाद-केंद्रित परिचालन को प्राथमिकता देते हैं।
  • भारतीय आईटी कंपनियों पर प्रभाव: GCCs बेहतर वेतन, उत्पाद अनुभव और दीर्घकालिक सामरिक कार्यों के माध्यम से प्रतिभा को आकर्षित करते हैं।
  • यह भारतीय कंपनियों के लिए AI एकीकरण, परामर्श सेवाएँ, प्लेटफ़ॉर्म इंजीनियरिंग और स्वचालन समाधान की ओर बढ़ने का अवसर प्रस्तुत करता है।

भारत के GCC पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियाँ

  • सीमित वैश्विक नेतृत्व भूमिकाएँ: तीव्र विस्तार के बावजूद भारत में अपेक्षाकृत कम वैश्विक निर्णय-निर्माण भूमिकाएँ हैं।
  • केवल लगभग 5% GCCs ‘रूपांतरण केंद्र’ बने हैं जिनके पास CXO-स्तरीय अधिकार और कार्यात्मक स्वायत्तता है।
  • प्रतिभा प्रतिस्पर्धा और कौशल अंतराल: GCCs की वृद्धि ने अत्यधिक कुशल पेशेवरों, विशेषकर AI, सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, क्लाउड इंजीनियरिंग एवं साइबर सुरक्षा में प्रतिस्पर्धा को तीव्र किया है।
  • गहन-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञता, अंतःविषय कौशल और नेतृत्व क्षमताओं की बढ़ती माँग है।
  • अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा: वियतनाम, फिलीपींस, पोलैंड और मैक्सिको जैसे देश वैकल्पिक GCC गंतव्य के रूप में उभर रहे हैं।
  • शहरी अवसंरचना बाधाएँ: अधिकांश GCCs बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुरुग्राम जैसे महानगरों में केंद्रित हैं।
  • इन शहरों को यातायात जाम, उच्च रियल एस्टेट लागत, शहरी अवसंरचना पर दबाव, जल और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ता है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: GCC पारिस्थितिकी तंत्र कुछ राज्यों में अत्यधिक केंद्रित है।
  • टियर-2 और टियर-3 शहरों की भागीदारी सीमित है।
  • डेटा सुरक्षा और नियामक चुनौतियाँ: संवेदनशील वैश्विक परिचालन संभालने के कारण डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, सीमा-पार डेटा प्रवाह और वैश्विक विनियमों के अनुपालन से संबंधित चिंताएँ बढ़ रही हैं।
  • वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भरता: GCC विस्तार बहुराष्ट्रीय निवेश निर्णयों पर अत्यधिक निर्भर है।
  • मंदी की प्रवृत्तियाँ, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान और प्रौद्योगिकी खर्च में मंदी GCC की वृद्धि और भर्ती को प्रभावित कर सकते हैं।
  • पारंपरिक आईटी सेवाओं पर दबाव: GCCs भारतीय आईटी कंपनियों के लिए प्रतिभा प्रतिस्पर्धा को तीव्र करते हैं।
  • GCCs प्रायः उच्च वेतन और उत्पाद-उन्मुख भूमिकाएँ प्रदान करते हैं।
  • पारंपरिक आउटसोर्सिंग कंपनियाँ मार्जिन और प्रतिभा बनाए रखने के दबाव का सामना करती हैं।
  • सीमित नवाचार स्वामित्व: भारत इंजीनियरिंग और उत्पाद विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन बौद्धिक संपदा (IP), मूल पेटेंट एवं सामरिक प्रौद्योगिकियों का स्वामित्व प्रायः विदेश स्थित मूल कंपनियों के पास रहता है।

सरकारी समर्थन और नीतिगत सहयोग

  • डिजिटल इंडिया कार्यक्रम (2015): इसने जीसीसी (GCC) संचालन के लिए आवश्यक डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया है। इसने भारत को उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अधिक आकर्षक बनाया है जो प्रौद्योगिकी, एआई और इंजीनियरिंग क्षमताओं की खोज में हैं।
  • इंडियाAI मिशन: इसका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक एआई केंद्र के रूप में स्थापित करना है। कई जीसीसी एआई मॉडल इंजीनियरिंग, एंटरप्राइज एआई परिनियोजन, ऑटोमेशन और एनालिटिक्स में तीव्रता से संलग्न हो रहे हैं।
    • एआई के लिए सरकारी समर्थन सीधे भारत के जीसीसी पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करता है।
  • राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर मिशन: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) का उद्देश्य घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण और डिजाइन क्षमताओं का निर्माण करना है।
    • भारत में कई जीसीसी चिप डिजाइन, एम्बेडेड सिस्टम और हार्डवेयर इंजीनियरिंग में कार्यरत हैं। 
    • यह नीति भारत की उन्नत इंजीनियरिंग सेवाओं में स्थिति को सुदृढ़ करती है।
  • स्टार्टअप इंडिया और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र: भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र जीसीसी विकास के लिए एक महत्वपूर्ण समर्थन संरचना बन गया है।
    • स्टार्टअप इंडिया, फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स, अटल इनोवेशन मिशन और उभरती प्रौद्योगिकियों में उत्कृष्टता केंद्र जैसी सरकारी पहलें इस दिशा में सहायक हैं। 
    • जीसीसी तीव्रता से एआई, SaaS प्लेटफॉर्म, साइबर सुरक्षा, फिनटेक और डीप-टेक नवाचार में स्टार्टअप्स के साथ सहयोग कर रहे हैं। 
    • इससे नवाचार क्षमता और प्रौद्योगिकी अपनाने में सुधार होता है।
  • कौशल विकास पहल: सरकार ने रोजगार क्षमता और डिजिटल कौशल में सुधार के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।
    • महत्वपूर्ण योजनाओं में स्किल इंडिया मिशन, नैसकॉम के साथ फ्यूचरस्किल्स प्राइम, डिजिटल स्किलिंग कार्यक्रम, एआई और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण पहल शामिल हैं। 
    • ये पहल डेटा साइंस, एआई/एमएल, क्लाउड कंप्यूटिंग, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और साइबर सुरक्षा में प्रतिभा पूल बनाने में सहायता करती हैं।
  • व्यवसाय करने में आसानी सुधार: भारत ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए व्यापार वातावरण में सुधार हेतु कई सुधार लागू किए हैं।
    • इन सुधारों से परिचालन बाधाएं कम होती हैं और निवेशकों का विश्वास बढ़ता है।
  • राज्य सरकार जीसीसी नीतियां:
    • कर्नाटक: बेंगलुरु भारत का सबसे बड़ा जीसीसी केंद्र है। कर्नाटक की प्रौद्योगिकी नीतियां एआई, अनुसंधान एवं विकास और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देती हैं।
    • तेलंगाना: हैदराबाद एक प्रमुख जीसीसी गंतव्य के रूप में उभरा है। यह प्रौद्योगिकी पार्क और नवाचार केंद्रों के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता है।
    • तमिलनाडु: इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग और ऑटोमोटिव जीसीसी पर केंद्रित। नीतियां कौशल विकास एवं औद्योगिक अवसंरचना का समर्थन करती हैं।
    • महाराष्ट्र: मुंबई और पुणे वित्त, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी जीसीसी को आकर्षित करते हैं।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZs) और आईटी पार्क: सरकार समर्थित आईटी पार्क और SEZs कर प्रोत्साहन, विश्वस्तरीय अवसंरचना और सरल निर्यात प्रक्रियाएं प्रदान करते हैं।
    • कई जीसीसी परिचालन लाभों के कारण SEZs और प्रौद्योगिकी पार्कों से संचालित होते हैं।
  • डेटा गवर्नेंस और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: भारत ने आधार, UPI, डिजिटल लॉकर और ONDC के माध्यम से सुदृढ़ डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण किया है।
    • भारत का डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी प्रयोग, फिनटेक नवाचार और एंटरप्राइज डिजिटल परिवर्तन का समर्थन करता है। 
    • यह भारत की छवि को एक डिजिटल नवाचार केंद्र के रूप में सुदृढ़ करता है।

आगे की राह

  • वैश्विक नेतृत्व उपस्थिति का निर्माण: बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में क्षेत्रीय और वैश्विक नेतृत्व भूमिकाएं स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना। प्रबंधकीय एवं रणनीतिक क्षमताओं का विकास करना।
  • एआई और डीप-टेक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना: एआई अनुसंधान और नवाचार क्षमता का विस्तार करना। सेमीकंडक्टर एवं उन्नत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना।
  • कौशल विकास को बढ़ाना: उद्योग-उन्मुख उच्च शिक्षा में सुधार करना। एआई, साइबर सुरक्षा और उन्नत इंजीनियरिंग में प्रशिक्षण बढ़ाना।
  • नवाचार स्वामित्व को प्रोत्साहित करना: सेवा वितरण से बौद्धिक संपदा निर्माण और उत्पाद स्वामित्व की ओर बढ़ना।

स्रोत: IE

 

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